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ye shab\-e\-firaaq ye bebasii hai.n kadam kadam pe udaasiyaa.N - - Ghulam Ali

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ये शब-ए-फ़िराक़ ये बेबसी हैं कदम कदम पे उदासियाँ
मेरा साथ कोई न दे सका मेरी हसरतें हैं धुवाँ धुवाँ

मैं तड़प तड़प के जिया तो क्या मेरे ख़ाब मुजह्से बिछड़ गये
मैं उदास घर की सदा सही मुझे दे न कोई तसल्लियाँ

चलीं ऐसी दर्द की आँधियाँ मेरे दिल की बस्ती उजड़ गई
ये जो राख सी है बुझी बुझी हैं इसी में मेरी निशानियाँ

ये फ़िज़ा जो गर्द-ओ-गुबार है मेरी बेकसी का मज़ार है
मैं वो फूल हूँ जो न खिल सका मेरी ज़िंदगी में वफ़ा कहाँ

'हसन' ऐसी जग में हवा चले जो उड़ा के मुझको भी ले चले
मैं वहीं पे उम्र गुज़ार दूँ जहाँ मेरे यार का आस्ताँ

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