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prem kaa hai is jag me.n pa.nth niraalaa

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प्रेम का है इस जग में पंथ निराला
प्रेम तो है इस दुनिया में कारण दुःख का
प्रेमी को होता है अनुभव सुख का
शीतल पवन है उसको प्रेम की ज्वाला (२)
प्रेम का है इस जग में पंथ निराला

प्रेम जपन की जग में रीत है न्यारी
असुवन के मनकों पर प्रेम पुजारी
रो-रो कर जपता है प्रेम की माला (२)
प्रेम का है इस जग में पंथ निराला

पागल प्रेमी अब तू क्यों रोता है, प्रेम का तो ऐसा ही फल होता है (२)
पहले काहे न तूने देखा-भाला (३)

Comments/Credits:

			 % Transliterator: K Vijay Kumar
		     
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