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mu.ntazir kab se Gair hai terii taqariir kaa - - Ghulam Ali

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मुंतज़िर कब से ग़ैर है तेरी तक़रीर का
बात कर तुझ पे गुमाँ होने लगा तसवीर का

रात क्या सोये कि बाकी उम्र की नींद उड़ गयी
ख़्वाब क्या देखा कि धड़का लग गया ताबीर का

कैसे पाया था तुझे फिर किस तरह खोया तुझे
मुझ सा मुन्किर भी तो क़ायल हो गया तक़दीर का

जाने किस आलम में तू बिछड़ा कि है तेरे बग़ैर
आज तक हर नक़्श फ़रियादी मेरी तहरीर का

जिसको भी चाहा बड़ी शिद्दत से चाहा है 'फ़राज़'
सिलसिला टूटा नहीं है दर्द की ज़ंजीर का

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