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kaise kaise log hamaare jii ko jalaane aa jaate hai.n

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कैसे कैसे लोग हमारे जी को जलाने आ जाते हैं
अपने अपने ग़म के फ़साने हमें सुनाने आ जाते हैं

मेरे लिये ये ग़ैर हैं और मैं इनके लिये बेगाना हूँ
फिर भी ये एक रस्म-ए-जहाँ है जिसे निभाने आ जाते हैं

इनसे अलग मैं रह नहीं सकता इस बेदर्द ज़माने में
मेरी ये मजबुरी मुझको याद दिलाने आ जाते हैं

सबकी सुन कर चुप रहते हैं दिल की बात नहीं कहते
आते आते जीने के भी लाख बहाने आ जाते हैं

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