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kab meraa nasheman ahal\-e\-chaman - - Habib Wali Mohammad

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कब मेरा नशेमन अहल-ए-चमन गुलशन में गँवारा करते हैं
गुँचे अपनी आवाज़ों में बिजली को पुकारा करते हैं

पोंछो न अरक़ रुख़्सारों से रंगीनी-ए-हुस्न को बढ़ने दो
सुनते हैं कि शबनम के क़तरे फूलों को निखारा करते हैं

जाती हुई मैय्यत देख के भी अल्लह तुम उठ कर आ न सके
दो चार क़दम तो दुशमन भी तक़लीफ़ गँवारा करते हैं

अब नज़ा का आलम है मुझ पर तुम अपनी मुहब्बत वापस लो
जब कश्ती डूबने लगती है तो बोझ उतारा करते हैं

Comments/Credits:

			 % Transliterator: K Vijay Kumar
		     
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