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jabase usane shahar ko chho.Daa har rastaa sunasaan hu_aa

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जबसे उसने शहर को छोड़ा हर रस्ता सुनसान हुआ
अपना क्या है सारे शहर का इक जैसा नुकसान हुआ

सहरा की मुँह-ज़ोर हवायें औरों से मन्सूब हुईं
मुफ़्त में हम आवारा ठहरे मुफ़्त में घर वीरान हुआ

मेरे हाल पे हैरत कैसी दर्द के तन्हा मौसम में
पत्थर भी रो पड़ते हैं इन्सान तो फिर इन्सान हुआ

उसके ज़ख़्म छुपा कर रखिये ख़ुद उस शख्स की नज़रों से
उससे कैसा शिकवा कीजे वो तो अभी नादान हुआ

यूँ भी कम-आमेज़ था 'मोहसिन' वो इस शहर के लोगों में
लेकिन मेरे सामने आकर और भी कुछ अन्जान हुआ

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