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jaag aur dekh zaraa aalam\-e\-viiraa.N meraa - - Saigal

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जाग और देख ज़रा आलम-ए-वीराँ मेरा
सुबह के भेस में निकला है गरीबाँ मेरा

बन्द आँखें किये यूँ जाग रहा हूँ शब-ए-ग़म
कि उन्हें आये नज़र ख़्वब-ए-परेशाँ मेरा

मुद्दतों कू-ए-वफ़ा आये कि बुत्खानों से
ऊद बन बन के जला है दिल-ए-सोज़ाँ मेरा

तुम्हें क्यों मद्द-ए-नज़र अब है ख़राबी इस की
तुम तो कहते थे कि घर है दिल-ए-इंसाँ मेरा

पड़ गई किस की निगाह-ए-मुतबस्सम 'सीमाब'
हो गया हर्फ़-ए-ग़लत दफ़्तर-ए-इसयाँ मेरा

Comments/Credits:

			 % Credits: Urzung Khan
		     
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