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Gam\-e\-dil kisase kahuu.N ko_ii bhii GamaKvaar nahii.n

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ग़म-ए-दिल किससे कहूँ कोई भी ग़मख़्वार नहीं
हैं सभी ग़ैर यहाँ कोई भी हमराज़ नहीं
ज़ख़्म-ए-दिल की ये जलन क़ाबिल-ए-इज़हार नहीं
हैं सभी ग़ैर यहाँ ...

सिलसिला टूट गया प्यार के अफ़सानों का
हो गया ख़ाक़ चमन तिनके बिखरा के गई
वो एक पुरदर्द हवा रह गए ग़म के निशाँ
ग़म-ए-दिल किससे कहूँ ...

आज अश्क़ों में बहे जाते हैं टूटे सपने
और ये दौर-ए-सितम किससे फ़रियाद करें
कौन सुने दिल की ज़ुबाँ है ये बेदर्द जहाँ
ग़म-ए-दिल किससे कहूँ ...

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