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zindagii kyaa hai Gam kaa dariyaa hai

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ज़िन्दगी क्या है ग़म का दरिया है
न जीना यहाँ बस में न मरना यहाँ बस में
अजब दुनिया है
ज़िन्दगी क्या है ...

हाय रे वो इन्सान के जिसको ग़म की नज़र लग जाए
चुपके-चुपके आहें भरे और मुँह से न कुछ कह पाए
दिल अपना हँसता है खुद पर ( और कभी रोता है ) -२
ज़िन्दगी क्या है ...

झूठी हैं दुनिया की बहारें रंग हैं सारे कच्चे
वक़्त पड़े तो थाम लें दामन फूल से काँटे अच्छे
इस गुलशन में क़दम-क़दम पर एक ( नया धोखा है ) -२
ज़िन्दगी क्या है ...

जब इन्सान अकेला था तो दुख भी न थे जीवन में
पाया जब हमराही उसने डूब गया उलझन में
ये दुनिया है बेगानों की कौन ( यहाँ अपना है ) -२
ज़िन्दगी क्या है ...

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