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ye Kvaab saa dekhaa thaa bas jaan\-e\-vafaa tum ho

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ये ख़्वाब सा देखा था बस जान-ए-वफ़ा तुम हो
हम जागे तो ये जाना जीने की सज़ा तुम हो

अरमान भरे दिल को इक ज़हर पिलाया है
वह साज़ हो तुम जिसने नग़्मों को रुलाया है
अब तुम ही ज़रा सोचो क्या इसके सिवा तुम हो

तुम प्यासी निगाहों की क्या प्यास बुझाओगी
कुछ दर्द सिवा होगा जब सामने आओगी
बेजान बहारों की बेरंग फ़िज़ा तुम हो

जिस हाल में हैं हमको उस हाल में रहने दो
अश्कों की ज़ुबाँ से तुम इतना हमें कहने दो
जो रूह को झुलसा दे वो गर्म हवा तुम्हो

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			 % Date: 15 Sep 2003
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