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ye bekasii ke a.Ndhere zaraa to Dhalane de

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ये बेकसी के अँधेरे ज़रा तो ढलने दे
बुझा न दे मेरे दिल का चराग़ जलने दे

ख़ुद अपनी आग में जलना मेरा मुक़द्दर है
मैं एक शम्मा हूँ पल-पल मुझे पिघलने दे

ये भटकी-भटकी जवानी ये डगमगाये क़दम
सँभल तो जाऊँ ज़माना अगर सँभलने दे

न सुन सके तो यहीं ख़त्म ज़िक्र-ए-ग़म कर दूँ
जो सुन सके तो मेरी दास्तान चलने दे

Comments/Credits:

			 % Transliterator: Arunabha S Roy
% Date: 30 Jan 2005
% Series: LATAnjali
% generated using giitaayan
		     
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