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wo ke har ahad\-e\-muhabbat se mukarataa jaaye

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वो के हर अहद-ए-मुहब्बत से मुकरता जाये
दिल वो ज़ालिम के उसी शख्स पे मरता जाये

मेरे पहलू में वो आया भी तो ख़ुश्बू की तरह
मैं उसे जितना समेटूँ वो बिखरता जाये

इश्क़ की नर्म-निगाही से बिना वो रुख़सार
ख़ूब वो हुस्न जो देखे से निखरता जाये

खुलते जायें जो तेरे बंद-ए-कबा ज़ुल्फ़ के साथ
रंग-ए-पैराहन-ए-जाँ और निखरता जाये

क्यूँ न हम उसको दिल-ओ-जान से चाहें 'दुश्नाम'
वो जो इक दुश्मन-ए-जाँ प्यार भी करता जाये

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