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uThatii nahii.n hai.n yuu.n hii tumase nashiilii palake.n

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उठती नहीं हैं यूं ही तुमसे नशीली पलकें
काजल का बोझ कैसे फिर तुम उठा सकोगी
काजल का बोझ ...

क्यूं सामने है दर्पन क़ातिल तेरी नज़र के
जाना है आज तुमको आखिर कहां संवर के
ज़ुल्फ़ों में फूल टांको कलियों से मांग भर लो
लेकिन कसम ख़ुदा की आँचल न रखना सर पे
शरम-ओ-हया से यूं ही गर्दन झुकी झुकी है
आँचल का बोझ कैसे फिर तुम उठा सकोगी
उठती नहीं हैं ...

हम जानते हैं ज़ालिम सब भेद तेरे मन के
तड़पा लो चाहे जितना मासूम हमको बन के
नाज़-ओ-अदा से देखो हमको तबाह कर दो
खुद पर सितम न करना पायल मगर पहन के
नाज़ुक कदम से यूं ही चलती हो डगमगाकर
पायल का बोझ कैसे फिर तुम उठा सकोगी
उठती नहीं हैं ...

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