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TuuTe hu_e Kaabo.n ke liye aa.Nkh ye tar kyuu.N

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टूटे हुए ख़ाबों के लिये आँख ये तर क्यूँ
सोचो तो सही शाम है अंजाम-ए-सहर क्यूँ

जो ताज सजाए हुए फिरता हो अनोखा
हालात के क़दमों पे झुकेगा वही सर क्यूँ

सिलते हैं तो सिल जाएं किसे फ़िक़्र लबों की
ख़ुश-रंग अँधेरों को कहूँगा मैं सहर क्यूँ

सोचा किया मैं हिज्र की दहलीज पे बैठा
सदियों में उतर जाता है लम्हों का सफ़र क्यूँ

हरजाई है 'शहज़ाद' ये तस्लें य पजाना
सोचा भी कभी तुमने हुआ ऐसा मग क्यूँ

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