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tiin taal par naach

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तीन ताल पर नाच बुढ़ापे बचपन और जवानी का
रंग हज़ारों मगर ज़िन्दगी एक बुलबुला पानी का

हरी-भरी डाली को यूँ ही पतझड़ में लुट जाना
है
खिला फूल जो आज चमन में कल उसको मुरझाना
है
सुबह हुई और ख़त्म फ़साना शबनम की ज़िन्दगानी
का

सारी दुनिया को हथियाने मूरख इनसाँ दौड़े रे
दो गज़ धरती बने बिछौना ऊपर माटी ओढ़े रे
मिले धूल में सपन सुहाना दुनिया की सुल्तानी का

एक बूँद की प्यास प्यार की ताल-तलैया रीते रे
बढ़ी मगर वो बुझ न पाई जनम हज़ारों बीते रे
दे न पाएँ सात समुन्दर एक भी क़तरा पानी का

Comments/Credits:

			 % Transliterator: Arunabha S. Roy
% Date: Nov 26, 2002
% generated using giitaayan
		     
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