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suquun dil ko mayassar gul\-o\-samar me.n nahii.n

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सुक़ून दिल को मयस्सर गुल-ओ-समर में नहीं
जो आशियाँ में है अपने वह बाग़ भर में नहीं

जहाँ है राह-ए-गुज़र कह रही है चलती साँस
सुक़ून की और उम्मीद उमर भर भी नहीं

न आसरा हो जिसे दूसरों का ए हमदम
वह ऐसा दिल है कि जैसे चिराग़ घर में नहीं

पराए दुःख को दुःख अपना समझ ले और दे साथ
बशर नहीं जो यह बात आरज़ू बशर में नहीं

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