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siine pe rakh ke sar ko kahii.n kho ga_e the ham

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सीने पे रख के सर को कहीं खो गए थे हम
थे इतने करीब के एक हो गए थे हम
सीने पे रख के सर ...

मुद्दत की प्यास थी तेरे होंठों का रस पिया
तेरे हसीन जिस्म को नज़रों से छू लिया
जादू बिखेरती थी समंदर की तर हवा
सिंदूर बन गया था हर इक ज़र्रा रेत का
आँखें खुली खुली थीं मगर सो गए थे हम
थे इतने करीब के ...

कोई न फ़ासला रहा साँसों के दरमियां
हर बात हो रही थी खामोश थी ज़ुबां
अरमां सिमट रहे थे बहारों की सेज पर
अहसास की गरमी थी दोनों थे बेखबर
दोनों जहां को पल भर भुला तो गए थे हम
थे इतने करीब के ...

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