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shaayad mai.n zi.ndagii kii sahar leke aa gayaa - - Jagjit Singh

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शायद मैं ज़िंदगी की सहर लेके आ गया
कातिल को आज अपने ही घर लेके आ गया

ता-उम्र ढूँढता रहा मंज़िल मैं इश्क़ की
अंजाम ये कि गर्द-ए-सफ़र लेके आ गया

नश्तर है मेरे हाथ में, कंधों पे मयक़दा
लो मैं इलाज-ए-दर्द-ए-जिग़र लेके आ गया

"फ़ाकिर" सनमकदे में न आता मैं लौटकर
इक ज़ख़्म भर गया था इधर लेके आ गया

Comments/Credits:

			 % Transliterator: Rajiv Shridhar 
% Date: 11/03/1996
		     
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