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sakhii kaise dharuu.N mai.n dhiir

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सखी कैसे धरूँ मैं धीर
हाय रे मेरे अब लो शाम न आये
रि बहे नैनों से निस दिन नीर
हाय रे मेरे अब लो शाम न आये
रि सखी कैसे धरूँ मैं धीर

घिर घिर शाम घटा लहराये
बेदर्दी की याद दिलाये
उन बिन मुरली कौन सुनाये
रि थारी रोऊँ मैं जमुना के तीर
हाय रे मेरे अब लो शाम न आये
रि सखी कैसे धरूँ मैं धीर

जी न करे, जोगन बन जाऊँ
जैसे बने उन्हें ढूँढ के लाऊँ
वो न मिले तो बिरज में न आऊँ
कहीं रस्ते में तज दूँ शरीर
हाय रे मेरे अब लो शाम न आये
रि बहे नैनों से निस दिन नीर
हाय रे मेरे अब लो शाम न आये
रि सखी कैसे धरूँ मैं धीर

Comments/Credits:

			 % Transliterator: K Vijay Kumar
		     
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