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sab me.n shaamil ho magar sabase judaa rahatii ho

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सब में शामिल हो मगर सबसे जुदा रहती हो
सिर्फ़ हमसे नहीं खुद से भी ख़फ़ा लगती हो
सब में शामिल ...

आँख उठती है न झुकती है किसी की ख़ातिर -२
साँस चढ़ती है न रुकती है किसी की ख़ातिर
जो किसी दर पे न ठहरे वो हवा लगती हो
सिर्फ़ हमसे नहीं ...

ज़ुल्फ़ लहराए तो आँचल में छुपा लेती हो -२
होंठ थर्राएँ तो दाँतों में दबा लेती हो
जो कभी खुल के न बरसे वो घटा लगती हो
सिर्फ़ हमसे नहीं ...

जागी-जागी नज़र आती हो न सोई-सोई -२
तुम जो हो अपने ख़्यालात में खोई-खोई
किसी मायूस मुसव्विर की दुआ लगती हो
सिर्फ़ हमसे नहीं ...

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