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roshanii saayaa\-e\-zulmaat se aage na ba.Dhii - - Talat

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रोशनी साया-ए-ज़ुल्मात से आगे न बढ़ी
ज़िंदगी शमा की इक रात से आगे न बढ़ी

अपनी हस्ती का भी इंसान को इरफ़ाँ न हुआ
ख़ाक फिर ख़ाक थी औक़ात से आगे न बढ़ी

दिल तो आमादा-ए-फ़रियाद रहा उनके हुज़ूर
आरज़ू शिद्दत-ए-जज़्बात से आगे न बढ़ी

ज़ुल्फ़ बर-दोश वो इक बार तो आये थे 'शकील'
फिर कोई रात भी उस रात से आगे न बढ़ी

Comments/Credits:

			 % Credits: Yogesh Sethi, U V Ravindra
		     
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