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raat chup\-chaap dabe paa.Nv chalii jaatii hai

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रात चुप-चाप दबे पाँव चली जाती है -२
रात ख़ामोश है रोती नहीं हँसती भी नहीं
रात चुप-चाप दबे पाँव चली जाती है
रात ख़ामोश है रोती नहीं हँसती भी नहीं
रात चुप-चाप दबे पाँव चली जाती है

काँच का नीला-सा गुम्बद है उड़ा जाता है -२
पाल खोले कोई बजरा-सा बहा जाता है
एक सैलाब है साहिल पे बिछा जाता है
रात चुप-चाप दबे पाँव चली जाती है

चाँद की किरनों में वो रोज़-सा रेशम भी नहीं -२
चाँद की चिकनी डली है कि घुली जाती है
और सन्नाटों की इक धूल उड़ी जाती है
रात चुप-चाप दबे पाँव चली जाती है

काश इक बार कभी नींद से उठ कर तुम भी -२
हिज्र की रातों में ये देखो तो क्या होता है

Comments/Credits:

			 % Contributor: V S Rawat
% Credits: Vinay P Jain
% Date: 26 Jul 2004
% Series: GEETanjali
% generated using giitaayan
		     
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