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piyaa toraa kaisaa abhimaan

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शु:
पिया तोरा कैसा अभिमान -२

गु:
किसी मौसम का झोंका था
जो इस दीवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरच्ची कर गया है
गये सावन में ये दीवारें यूँ सीली नहीं थीं
न जाने इस दफ़ा क्यूँ इन में सीलन आ गयी है
दरारें पड़ गयी हैं
और सीलन इस तरह बहती है जैसे
ख़ुश्का रुख़सारों पे गीले आँसू बहते हों

शु:
सघन सावन लायी कदम बहार
मथुरा से डोली लाये चारों कहार
नहीं आये केसरिया बलमा हमार
अंगना बड़ा सुनसान

गु:
ये बारिश गुनगुनाती थी
इसी च्चत की मुंडेरों पर ये बारिश गुनगुनाती थी
इसी च्चत की मुंडेरों पर
ये घर की खिड़कियों के काँच पर उंगली से लिख जाती थी संदेसे
बिलगती रहती है बैठी हुई अब बंद रोशनदानों के पीछे

शु:
अपने नयन से नीर बहाये
अपनी जमुना ख़ुद आप ही बनावे

गु:
दोपह्रें ऐसी लगती हैं
बिना मोहरों के खाली खाने रक्खे हैं
न कोई खेलने वाला है बाज़ी
न कोई चाल चलता है

शु:
लाख बार उसमें ही नहाये
पूरा न होयी स्नान
फिर पूरा न होयी स्नान
सूखे केस रूखे भेस
मनवा बेजान

गु:
न दिन होता है अब न रात होती है
सभी कुछ रुक गया है
वो क्या मौसम का झोंका था
जो इस

शु:
पिया तोरा कैसा अभिमान.

Comments/Credits:

			 % Transliterator: V S Rawat
% Date: 4 Jan 2005
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