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pighalaa hai sonaa duur gagan par

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ल: पिघला है सोना दूर गगन पर
फ़ैल रहें हैं शाम के साये

को: भगवन तेरे सुन्दर रचना कितनी प्यारी है
तेरी महिमा के गुण गाता हर नर-नारी है

ल: खामोशी कुछ बोल रही हैं
भेद अनोखे खोल रही हैं
पंख पखेर्ऊ सोच मे ग़ुम हैं
पेड़ खड़े है सिर झुकाए
पिघला है सोना ...

धुंदले धुंदले मस्त नज़ारें
उड़ते बादल मुड़ते धारे
छुप के नज़र से जाने ये किस ने
हसरती ये खेल रचाए
पिघला है सोना ...

कोई भी उठता राज़ न जाने
एक हक़ीक़त लाख़ फ़साने
एक ही जलवा शाम सवेरे
भेस बदल कर सामने आए
पिघला है सोना ...

Comments/Credits:

			 % Transliterator: Prithviraj Dasgupta
% Date: Mar 15, 2001
		     
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