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pa.nchhii mere man kaa aaj u.Daa jaa_e

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पंछी मेरे मन का आज उड़ा जाए
ऊँचे पहाड़ों को छू के चला जाए
होश छीन लिए मदहोश किए जाए
हुई मैं दीवानी हुई

को : छम-छम-छम-छम-छम

भीगे होंठों से शबनम चुराए
भँवरा कलियों का घूँघट उठाए
उड़ कर गुलशन से चंचल हवाएँ
सारी दुनिया में ख़ुश्बू लुटाएँ
इन बहारों में भी महकने लगी
चैन मेरा गया मैं बहकने लगी
छा गया दिल पे कोई नशा

ऐसे चढ़ा है दरिया का पानी
जैसे लहरों पे आई जवानी
ऊँचे-ऊँचे दरख़्तों के साथ
हर मुसाफ़िर के मन को लुभाए
है यही आरज़ू घर बसा लूँ यहीं
अब यहाँ से न मैं दूर जाऊँ कहीं
होगी ऐसी न कोई जगह
पंछी मेरे मन का ...

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