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paiGaam de rahii hai ye shaam Dhalate Dhalate

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पैगाम दे रही है ये शाम ढलते ढलते
बनती है ज़िंदगी मैं हर बात बनते बनते (२)

हमसफ़र के बिना तो मज़ा आये न
ज़िंदगी मैं अकेला रहा जाये ना
कोइ हमें मिल गया ऐसे ही चलते चलते
बनती है ज़िंदगी में हर बात बनते बनते

सजे दिल चढ़े मुस्कुराकर कोई
देखले हमको नज़रें उठाकर कोई
हम खाक हो ना जाएं यूँ आह भरते भरते
बनती है ज़िंदगी में हर बात बनते बनते

Comments/Credits:

			 % Transliterator: Ravi Kant Rai (rrai@plains.nodak.edu)
		     
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