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pahachaan to thii pahachaanaa nahii.n mai.nne

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पहचान तो थी पहचाना नहीं मैंने
अपने आप को जाना नहीं
पहचान तो थी

जब धूप बरसती है सर पे तो
पानी में छाँव खिलती है
मैं भूल गई थी छाँव अगर
मिलती है तो धूप में मिलती है
इस धूप और छाँव की खेल में क्यों
जिनका इशारा समझा नहीं
पहचान ...

मैं जागी रही कुछ सपनों में और
जागी हुई भी सोई रही
जाने किन भूलभुलैया में कुछ
भटकी रही कुछ खोई रही
जिनके लिये मैं मरती रही
जिनका इशारा समझा नहीं
पहचान ...

Comments/Credits:

			 % Transliterator: Ravi Kant Rai (rrai@ndsun.cs.ndsu.nodak.edu)
% Credits: Header Info: Pradeep Dubey (pradeep@watson.ibm.com)
% Editor: Anurag Shankar (anurag@astro.indiana.edu)
		     
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