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o manachalii, kahaa.N chalii

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ओ मनचली, कहाँ चली - २
देख देख देख देख मुझ से न शरमा
एक एक एक मैं हूँ भंवरा
और तू कली, ओ मनचली ...

होठों पे लेके तेरा नाम
आई है रंग भरी शाम
फूलों से छलके हैं जाम
भंवरों ने दिल लिये थाम
ऐसे में, हे हे हो ए हे हो
ऐसे में, तोड़ के प्रेम की डोरी
ओ गोरी, चकोरी, तू कहाँ चली ...

दुनिया से नहीं डरेंगे
हम तुम मुलाक़ाते करेंगे
आजा दो बाते करेंगे
रंगीं बरसातें करेंगे
ये सच है ए हे ओ ओ ए हे ओ ओ
ये सच है मैं हूँ एक दीवाना
न जाना, न माना, तू कहाँ चली ...

रुत ऐसी आई हुई है
बदली सी छाई हुई है
तू क्यों शरमाई हुई है
मुझसे घबराई हुई है
प्यार में ए हे ओ ओ ए हे ओ ओ
प्यार में यार से आँख चुराके
छुपाके, बचाके, तू कहाँ चली ...

Comments/Credits:

			 % Credits: C. S. Sudarshana Bhat (cesaa129@utacnvx.uta.edu)
%          Venkatasubramanian K Gopalakrishnan (gopala@cs.wisc.edu)
%          Preetham Gopalaswamy (preetham@src.umd.edu)
% Editor: Anurag Shankar (anurag@astro.indiana.edu)
		     
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