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mat maaro shaam pichakaarii

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मत मारो शाम पिचकारी
मोरी भीगी चुनरिया सारी रे...

नाजुक तन मोरा रंग न डारो शामा
अंग-अंग मोर फड़के
रंग पड़े जो मोरे गोरे बदन पर
रूप की ज्वाला भड़के
कित जाऊँ मैं लाज की मारी रे
मत मारो शाम...

काह करूँ कान्हा, रूप है बैरी मेरा
रंग पड़े छिल जाये
देखे यह जग मोहे, तिरछी नजरिया से
मोरा जिया घबराये
कित जाऊँ मैं लाज की मारी रे
मत मारो शाम...

Comments/Credits:

			 % Transliterator: K Vijay Kumar
		     
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