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kyuu.N pyaalaa chhalakataa hai

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क्यूँ प्याला छलकता है
क्यूँ दीपक जलता है
दोनों के मन में कहीं अनहोनी विकलता है
क्यूँ प्याला छलकता है

पत्थर में फूल खिला
दिल को एक ख़्वाब मिला
क्यूँ टूट गए दोनों
इसका ना जवाब मिला
दिल नींद से उठ उठ कर
क्यूँ आँखें मलता है..

हैं राख की रेखाएँ
लिखती है चिंगारी
हैं कहते मौत जिसे
जीने की तैयारी
जीवन फिर भी जीवन
जीने को मचलता है..

Comments/Credits:

			 % Contributor: Vinay P Jain
% Transliterator: Vinay P Jain
% Date: Dec 4, 2002
% Series: GEETanjali
% generated using giitaayan
		     
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