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kuchh aise bhii pal hote hai.n - - Manna Dey

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कुछ ऐसे भी पल होते हैं
जब रात के गहरे सन्नाटे गहरी सी नींद में सोते हैं
तब मुसकानो के दर्द यहाँ बच्चों की तरह से रोते हैं

जब छा जाती है ख़ामोशी तब शोर मचाती है धड़कन
इक मेला जैसा लगता है बिखरा बिखरा ये सूनापन
यादों के साए ऐसे में करने लगते हैं आलिंगन
चुभने लगता है साँसों में बिखरे सपनों का हर दर्पन
फिर भी जागे ये दो नैना सपनों का बोझ संजोते हैं

यूं ही हर रात पिघलती है यूं ही हर दिन ढल जाता है
हर सांझ यूं ही ये बिरही मन पतझड़ में फूल खिलाता है
आखिर ये कैसा बन्धन है आखिर ये कैसा नाता है
जो जुड़ तो गया अनजाने में पर टूट नहीं अब पाता है
और हम उलझे इस बन्धन में दिन रात ये नैन भिगोते हैं

Comments/Credits:

			 % Transliterator: Uday Patel, 2003-02-10
		     
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