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kisii maharabaa.n ne aa kar merii zi.ndagii sajaa dii

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किसी महरबां ने आकर मेरी ज़िंदगी सजा दी
मेरी धड़कनों में नई आरज़ू जगा दी
मेरी धड़कनों ...

तन्हाइयों की हरदम आगोश का ये मन्ज़र
ठहरा हुआ था मेरी बेताबी का समन्दर
मांझी का आगे छेड़ा हलचल लो मचा दी
किसी महरबां ने ...

आईं नई बहारें बरसात की रात हो तुम
वो आरज़ू में गुज़रती थी बेनूर का ये आलम
अन्धेरे रास्ते में मुझे रोशनी दिखा दी
किसी महरबां ने ...

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