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khumaar\-e\-Gam hai ... tere Kayaal kii aab\-o\-hawaa

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ख़्हुमार-ए-ग़म है महकती फ़िज़ा में जीते हैं
तेरे ख़्हयाल की आब-ओ-हवा में जीते हैं

बड़े तपाक से मिलते हैं मिल्ने वाले मुझे
वो मेरे दोस्त हैं तेरी वफ़ा में जीते हैन

फ़िराक़-ए-यार में साँसों को रोके रखते हैं
हरेक लम्हा गुज़रती कज़ा में जीते हैं

न बात पूरी हुई थी कि रात टूट गई
अधूरे ख़्ह्वाब की आधी सज़ा में जीते हैं

तुम्हारी बातों में कोई मसीहा बसता है
हसेएं लबों से बरसती शफ़ा में जीते हैं

Comments/Credits:

			 % Contributor: Vinay P Jain
% Transliterator: Vinay P Jain
% Date: 10 Jun 2003
% Series: GEETanjali
% generated using giitaayan
		     
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