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khulii jo aa.Nkh to wo thaa na wo zamaanaa thaa

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खुली जो आँख तो वो था न वो ज़माना था
दहकती आग थी तन्हाई थी फ़साना था

ग़मों ने बाँट लिया है मुझे यूँ आपस में
कि जैसे मैं कोई लूटा हुआ ख़ज़ाना था

जुदा है शाख़ से गुल-रुत से आशियाने से
कली का जुर्म घड़ी भर का मुस्कुराना था

ये क्या कि चन्द ही क़दमों में थक के बैठ गये
तुम्हें तो साथ मेरा दूर तक निभाना था

मुझे जो मेरे लहू में डबो के गुज़रा है
वो कोई ग़ैर नहीं यार एक पुराना था

ख़ुद अपने हाथ से 'शहज़ाद' उसको काट दिया
कि जिस दरख़्त की टहनी पे आशियाना था

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			 % This Gazal is also in Sadaf
		     
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