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kalii kisii kii mohabbat kii muskuraatii hai

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कली किसी की मोहब्बत की मुस्कुराती है
हाँ
किसी के घर में बहार आ के लौट जाती है

कोई चले काँटों पे कोई फूल खिलाये
कोई फूल खिलाये
कोई चले काँटों पे कोई फूल खिलाये
किसी की कश्ती है मौजों में सुख की बहने को
कोई है सिर्फ़ मोहब्बत में जुर्म सहने को
( दिल तड़पे किसी का कोई आराम लुटाये
आराम लुटाये ) -२

किसी के होंठों पे आई ख़ुशी हँसी बन के
किसी के दिल में बसा दर्द ज़िंदगी बन के
पहुँचे कोई मंज़िल पे तो ठोकर कोई खाये
ठोकर कोई खाये
कोई चले काँटों पे कोई फूल खिलाये
कोई फूल खिलाये

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