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ka_ii baar yuu.N hii dekhaa hai

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कई बार यूं ही देखा है
ये जो मन की सीमा रेखा है
मन तोड़ने लगता है
अन्जानी प्यास के पीछे
अन्जानी आस के पीछे
मन दौड़ने लगता है

राहों में, राहों में, जीवन की राहों में
जो खिले हैं फूल फूल मुस्कुराके
कौन सा फूल चुराके, रख लूं मन में सजाके
कई बार यूं ही देखा है ...

जानूँ न, जानूँ न, उलझन ये जानूँ न
सुलझाऊं कैसे कुछ समझ न पऊँ
किसको मीत बनाऊँ, किसकी प्रीत भुलाऊँ
कई बार यूं ही देखा है ...

Comments/Credits:

			 % Contributor:  Reeta Sinha (librs@emory.edu)
% Transliterator: Ravi Kant Rai (rrai@plains.nodak.edu)
% Credits: ShashiKant rava0002@gold.tc.umn.edu
%          Ravi K. Sista 
% Editor: Anurag Shankar (anurag@chandra.astro.indiana.edu)
		     
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