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kahii.n ishq kaa taqaazaa kahii.n husn ke ishaare - - Talat

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कहीं इश्क़ का तक़ाज़ा कहीं हुस्न के इशारे
न बचा सकेंगे दामन ग़म-ए-ज़िंदगी के मारे

शब-ए-ग़म की तीरगी में मेरी आह के शरारे
कभी बन गये हैं आँसू कभी बन गये हैं तारे

जिन्हें हो सका न हासिल कभी कैफ़-ए-क़ुर्ब-ए-मंज़िल
वही दो कदम हैं मुझको तेरी जुस्तजू से प्यारे

मैं 'शकील' उनका हो कर भी न पा सका हूँ उनको
मेरी तरह ज़िंदगी में कोई जीत कर न हारे

Comments/Credits:

			 % Credits: U V Ravindra
		     
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