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kabhii shaakh\-o\-sabzaa\-o\-barg par - - Talat

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कभी शाख़-ओ-सब्ज़ा-ओ-बर्ग पर
कभी ग़ुंचा-ओ-गुल-ओ- ख़ार पर
मैं चमन में चाहे जहाँ रहूँ
मेरा हक़ है फ़सल-ए-बहार पर

मुझे दे न ग़ैब में धमकियां
गिरें लाख बार ये बिजलियां
मेरी सर तनक यही आशियां
मेरी मिल्कियत यही प्यार पर

मेरी सर तनक येही आशियां
मेरी सिम्ट से उसे ऐ सबा
ये पयाम-ए-आख़िर-ए-ग़म सुना
अभी देखना हो तो देख जा
के ख़िज़ां है अपनी बहार पर

ये फ़रेब-ए-जलवा-ए-सर बसर
मुझे डर है ये दिल-ए-बेख़बर
कहीं जम न जाये तेरी नज़र
इन्हीं चंद नक़्श-ओ-निगार पर

Comments/Credits:

			 % Transliterator: K Vijay Kumar

% shaaKh-o-sabzaa-o-barg = branch and verdure and leaf
% Gu.nchaa -o - gul-o- Khaar = bud and flower and thorn
% fasal-e-bahaar = season of spring
% gaib = invisible; the future
% sar tanak = head to toe
% milkiiyat = possesion
% simt = direction; sabaa = gentle breeze
% payaam-e-aakhire = final message
% khizaa.n = decay
% pharebe jalwaae sar basar = illusion
% phareb = deceit; sar basar = entirely
% naqash-o-nigaar = embellishments; decorations
		     
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