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kabhii ai haqiiqat\-e\-mu.ntazar

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कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र, नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
के हज़ारों सजदे तड़प रहे हैं मेरी जबीन-ए-नियाज़ में

न बचा-बचा के तू रख इसे, तेरा आईना है वो आईना
के शिकस्ता हो तो अज़ीज़तर है निगाह-ए-आईनासाज़ में

न वो इश्क़ में रहीं गर्मियाँ, न वो हुस्न में रहीं शोख़ियाँ
न वो ग़ज़नवी में तड़प रही
न वो खम है ज़ुल्फ़-ए-आयाज़ में

मैं जो सर-ब-सजदा कभी हुआ, तो ज़मीं से आने लगी सदा
तेरा दिल तो है सनम आशना, तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में

कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र, नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
के हज़ारों सजदे तड़प रहे हैं मेरी जबीन-ए-नियाज़ में

Comments/Credits:

			 % Transliterator: Rajiv Shridhar 
% Date: 01/17/1996
% Credits: Vandana Venkatesan 
% Editor: Rajiv Shridhar 
		     
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