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kaabe se butaqade se kabhii bazm\-e\-yaar se - - Talat

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काबे से बुतक़दे से कभी बज़्म-ए-यार से
आवाज़ दे रहा हूँ तुझे हर मुकाम से

न आशना है आज वही मेरे नाम से
दुनिया पुकारती थी जिन्हे मेरे नाम से

उफ़, ये शब-ए-फ़िराक़ के मारों की बेख़ुदी
ख़ुद हि बुझा दिया है चराग़ों को शाम से

दिल में फ़रेब, लब पे तबस्सुम, नज़र में प्यार
लुटे गए 'शमीम' बड़े ऐह्तमाम से

Comments/Credits:

			 % Transliterator: Rajiv Shridhar (rajiv@hendrix.coe.neu.edu)
% Date: Fri Jan 19, 1996
% Editor: Rajiv Shridhar (rajiv@hendrix.coe.neu.edu)
		     
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