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jab pukaaraa hai tujhe apanii sadaa aa_ii hai

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जब पुकारा है तुझे अपनी सदा आई है
दिल की दीवार से लिपटी हुई तन्हाई है

है कोई जौहरी अश्क़ों के नगीनों का यहाँ
आँख बाज़ार में इक जिंस-ए-गिराँ लाई है

दिल की बस्ती में तुम आये हो क्या पाओगे
अब यहाँ कोई तमाशा न तमाशाई है

दिल भी आबाद है इक शहर-ए-ख़मोशाँ की तरह
हर तरफ़ लोग मगर आलम-ए-तन्हाई है

जिस की आँखों से बरसती हैं लहू की बूँदें
ये वोही मोहसिन-ए-आशुफ़्ता-ओ-सौदाई है

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