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hazaar raahe.n mu.D ke dekhii.n

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कि: हज़ार राहें, मुड़के देखीं
कहीं से कोई सदा ना आई
ल: बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई ...

कि: जहाँ से तुम मोड़ मुड़ गये थे - २
वो मोड़ अब भी वही खड़े हैं
ल: हम अपने पैरों में जाने कितने - २
भंवर लपेटे हुए खड़े हैं
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई ...

कि: कहीं किसी रोज़ यूं भी होता
हमारी हालत तुम्हारी होती
ल: जो रातें हमने गुज़ारी मरके
वो रात तुमने गुज़ारी होतीं
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई...

कि: उन्हें ये ज़िद थी के हम बुलाते
हमें ये उम्मीद वो पुकारें
ल: है नाम होंठों में अब भी लेकिन
आवाज़ में पड़ गई दरारें

कि: हज़ार राहें, मुड़के देखीं
कहीं से कोई सदा ना आई
ल: बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई...

Comments/Credits:

			 % Transliterator: Ravi Kant Rai (rrai@plains.nodak.edu)
% Editor: Anurag Shankar (anurag@chandra.astro.indiana.edu)
		     
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