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har qadam par nit na_e saa.Nche me.n

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हर क़दम पर नित नए साँचे में ढल जाते हैं लोग
देखते ही देखते कितने बदल जाते हैं लोग

किस लिये कीजे किसी गुम्गश्ता जन्नत की तलाश
जब कि मिट्टी के खिलोनों से बहल जाते हैं लोग

शमा की मानिन्द अह्ल-ए-अंजुमन से बे-नियाज़
अकसर अपनी आग में चुप चाप जल जाते हैं लोग

'शयर' उन की दोस्ती का अब भी दम भरते हैं आप
ठोकरें खा कर तो सुनते हैं सम्भल जाते हैं लोग

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			 % Comments:Noor-e-Trannum #
		     
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