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Gam\-e\-aashiqii se kah do raah\-e\-aam tak na pahu.Nche - - Talat

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ग़म-ए-आशिक़ी से कह दो राह-ए-आम तक न पहुँचे
मुझे ख़ौफ़ है ये तोहमत मेरे नाम तक न पहुँचे

मैं नज़र से पी रहा था तो ये दिल ने बद-दुआ दी
तेरा हाथ ज़िंदगी भर कभी जाम तक न पहुँचे

ये आदा-ए-बेनियाज़ी तुझे बेवफ़ा मुबारक
मगर ऐसी बेरुखी क्या कि सलाम तक न पहुँचे

वही इक खामोश नग़मा है 'शकेएल' जान-ए-हस्ती
जो ज़ुबान तक न आये जो कलाम तक न पहुँचे

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