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dvaar khulii ... sakhi rii chitachor nahii.n aa_e

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द्वार खुली मन मंदिर के
चितचोर नहीं आए नहीं आए

सखि री चितचोर नहीं आए
गरजी बदली फिर भी नाचने मोर नहीं आए

देख रे भँवरे खिल रही बगियाँ
दूर दूर क्यों गूँजे रसिया
पार हूँ न हम से भई बैरी
काहे तू इस ओर नहीं आए
सखि री चितचोर नहीं आए

Comments/Credits:

			 % Transliterator: Prithviraj Dasgupta
% Date: Mar 10, 2001
		     
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