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dekho binaa saavan baras rahii badalii

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देखो बिना सावन बरस रही बदली -२
पिया के दरस को तरस रही बदली
देखो बिना सावन ...

पी बिन दुनिया सूनी हो गई मन की पीड़ा दूनी हो गई
सौ ग़म जागे क़िस्मत सो गई छलक रही नैनन की गगरी
देखो बिना सावन ...

रह गई बिरहन हार पिरोती टूटे सपने बिखरे मोती
बिछड़ ग़ई दीपक से ज्योति उजड़ गई रे मन की नगरी
देखो बिना सावन ...

इस दुनिया ने प्यार है छीना रह गया अब तो आँसू पीना
दूर सजन से अब क्या जीना छोड़ दे अब तो दुनिया पगली
देखो बिना सावन ...

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