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dastuur ibaadat kaa duniyaa se niraalaa ho - - Vinod Sehgal

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दस्तूर इबादत का दुनिया से निराला हो
इक हाथ में माला हो इक हाथ में प्याला हो

पूजेंगे सलीक़े से अंदाज़ मगर अपना
हो याद-ए-ख़्हुदा दिल में साक़ी ने सम्भाला हो

मस्ती भी तक़द्दुस भी एक साथ चले दोनों
इक सिम्ट हो मैख़्हाना इक सिम्ट शिवाला हो

मस्जिद की तरफ़ से तू जाना न कभी साक़ी
ज़ाहिद भी कहीं तेरा न चाहनेवाला हो

वोह डूब कर मर जायें मदिरा की सुराही में
माशुक़ ने गर दिल की महफ़िल से निकाला हो

Comments/Credits:

			 % Date:03/17/2000
% Transliterator:
% Editor: Indu Shukla
		     
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