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chekhush nazaare ke khud pukaare hai

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( चेखुश नज़ारे ) -२ के खुद पुकारे
है यार की मंज़िल

गुलों की वादी सबा की बस्ती गली बहारों की
निगाह को थी तलाश कब से इन्हीं नज़ारों की
कि बेखुदी में निकल पड़ा है उठा के साज़-ए-दिल
चेखुश नज़ारे ...

ये वो महल है करके दरीचा है आसमाँ जिसका
ये वो है चिलमन कि जिसके पीछे है वो हसीं क़ातिल
चेखुश नज़ारे ...

Comments/Credits:

			 % Credits: Ashok Dhareshwar
		     
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