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cha.nchal shoK havaa_o jaa ke sajanaaa se kahanaa

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चंचल शोख हवाओं जा के सजनाअ से कहना
मैं बागों की बुलबुल मुझे पिंजरे में नहीं रहना
चंचल शोख हवाओं ...

अम्बर के नीचे पनघट के पीछे ऐसे ही गाती रहूंगी मैं
बुलबुल गुलिस्तां को नग़्में यूं ही सुनाती रहूंगी मैं
पायल बजाती खुश्बू लुटाती मैं हूँ सहेली बहारों की
शबनम की बूटी फूलों की लड़ियां हैं मेरा गहना
चंचल शोख हवाओं ...

बीती कहानी बातें पुरानी मुझको बहुत याद आती हैं
प्यासी फ़िज़ाएं तेरी सदाएं
कैसे मिलेंगे हम दोबारा मैं पूछता हूँ नज़ारों से
दर्द जुदाई का अब तो मुझे नहीं सहना
चंचल शोख हवाओं ...

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