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chalii pii ko milan ban Than ke dulhan

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चली पी को मिलन बन ठन के दुल्हन
झन झननन पायल गावत है
अब काहे को देर करो री सखी
मोरा मैके में जिया घबरावत है

मैं तो बाबुल से मुख मोड़ चली
वीरन संग नाता तोड़ चली
उस छोर कभी जा के री सखी
कोई लौट के फिर नहीं आवत है

कब दीप जले बिन बाती के
कब राह कटे बिन साथी के
जि सागर से बिछड़े नदिया
उस सागर में मिल जावत है

Comments/Credits:

			 % Transliterator: K Vijay Kumar
		     
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